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ABHINAV SHUKLA USA

AMERICA SE ABHINAV SHUKLA KI KAVITAYEN रचना प्रक्रिया

पहले तो बात सुन के ज़रा डोलते हैं हम,
फिर एक एक करके पर्त खोलते हैं हम,
कुछ मूल जानने की लगाते हैं हम जुगत,
कुछ उसमें छुपे सत्य को टटोलते हैं हम,
जब लगता है ये बात सुनाने के योग्य है,
भाषा की चाशनी में भाव घोलते हैं हम,
कसते हैं कसौटी पे ह्रदय की कलाम को,
तब जाके चार शब्द कहीं बोलते हैं हम।

कविता वही है

एक लम्बे समय तक चले,
घनघोर शीतयुद्ध के बाद,
जब घर पर पिताजी नें हमें,
नालायक शिरोमणी की उपाधि करते हुए,
हमारे कवि हो जाने का ऐलान किया,
तब हमें अपना भविष्य बिल्कुल क्लियर दिखाई दिया,
दूर दूर तक कुछ भी नहीं था,
और जो दिख रहा था वह बिल्कुल सही था,
युद्ध विराम कि स्तिथि के कारण,
एल ओ सी पर शांति व्यवस्था बहाल हो गई थी,
हम और पिताजी आपस के बैर भुला कर, कभी कभार,
एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा लेते थे,
पिताजी मुस्कुराते हुए सोचते होंगे कि,
'बच्चू, अभी दो ही दिन में आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाएगा,'
हम ये सोचते थे कि,
जब कविता करके आदमी प्रधानमंत्री बन सकता है,
तो अपना भी झंडा किसी ऊँची चोटी पर जाकर गड़ जाएगा,
लेकिन अपना भविष्य ऐसे कैसे दांव पर लगा दिया जाए,
कविता के बारे में पब्लिक ओपिनियन क्या है पता किया जाए,
पिताजी तो अपनी राय पहले ही दे चुके थे,
कविता मात्र अमीरों का सौंदर्य प्रसाधन है,
समय नष्ट करने का एक निकृष्ट साधन है,
तुम्हे आई आई टी में सेलेक्ट हुए अपने मामा से कुछ ज्ञान लेना चाहिए,
केवल पढ़ाई की ओर ध्यान देना चाहिए।

मां नें कहा,
बेटा, बचपन में हम लोग कवि सम्मेलन सुनने जाते थे,
अपनी डायरियों में भी कविताएँ नोट करके लाते थे,
कवि वही है जो ह्रदय से सच्चा हो, वैसे तुम भी लिखते अच्छा हो।

छोटे भाई नें कहा,
अबे, मेरे आयल फ्री पापड़ पर चुपड़े हुए मक्खन,
मिट्टी के तेल के पीपे के अन्दर वाले ढक्कन,
तू बड़ा महान है, वीर हनुमान है,
हम जैसे लोगों का राबिनहुड है, याद रख तेरा लक्ष्य बालीवुड है,
तू वहां पहुँच कर गीतकार बन जा, फिर मेरे वहां पहुँचने की बात चला,
सोच हम दोनों को जब फिल्मफेयर अवार्ड लेने के लिए बुलाया जाएगा,
तो कैसा मज़ा आएगा, तू बेस्ट लिरिसिस्ट और मैं बेस्ट एक्टर,
फिर हम गाँव के खेत में चलाएँगे ट्रेक्टर,
वैसे कविता में लेना चाहिए नए शब्दों का सहारा,
जैसे कठफोड़वा, फड़फड़ाहट, लक्कड़हारा,

इस मामले में पत्नी से हमारी अच्छी निभ जाती है,
उसे हमारी भाषा समझ में ही नहीं आती है,

फिर हम घर के बाहर आए, अन्य लोगों नें भी अपने विचार बताए,
एक नें कहा, कविता का अर्थ, भूख, गरीबी, कमज़ोरी, कड़की है,
दूसरा नें कहा कि, मेरे पड़ोस में रहने वाले डाक्टर साहब की लड़की है,
तीसरे नें कहा खूबसूरत नायिका है,
चौथा बोला, फिल्मों में गायिका है,
पाँचवा बोला, रिसर्च आब्जेक्ट है,
छठा बोला, एम ए का एक सब्जेक्ट है,
सातवां बोला, प्रश्न गहरा है,
आठवां बोला, हमसे मत पूछो, अपन तो जन्मजात बहरा है,
नवाँ बोला, कविता नदी पर बने सुंदर पुल सी है,
दसवाँ बोला, सूर, कबीर, मीरा, तुलसी है,
कोई बोला, कविता देवी माता के आगे जलती ज्योत है,
कोई बोला, हम क्या जानी क्या होत है,
कोई बोला, कविता चार लाईना सुना रिया हूँ है,
कोई बोला, पुराने ज़माने में ही हुआ करती थी रै,

जब यह सवाल हमनें किया मंचों पर धूम धड़ाके से चलने वाले एक कवि से,
तो वह ज़रा देर तक तो रहा विचारों में खोया,
फिर उसने अपनी भावनाओं को ईमानदारी के शब्दों में पिरोया,
फिर बोला, जब मैंने लिखना शुरू किया था,
तब कविता मानव मन का सम्मान थी,
सरस्वती माता का अनमोल वरदान थी,
पर जब से मंचों के बाज़ार में आया हूँ,
मेरी आत्मा में एक मलाल बो गई है,
कविता, दुकान पर बिकने वाला माल हो गई है,

इन सब महानुभावों की राय के बाद, जब हमने अपने हृदय से पूछा,
कि कविता क्या होती है उस्ताद,
तो उसने उत्तर दिया कि,
कविता है बच्चे की किलकारी, महके हुए फूलों की क्यारी,
चिड़ियों की चहचहाट, शब्दों की तुतलाहट,
जहाँ कहीं भी भावना है, संवेदना है, पीड़ा है, वेदना है,
प्रसन्नता है, उल्लास है, जज़्बात हैं, एहसास है,
और जो वहाँ पर भी है, जहाँ कुछ भी नहीं है,
कविता वही है।

दाढ़ी

भारत के ऋषि मुनियों नें पाला था शान से,
जगमग थी ज्ञानियों पे दमकते गुमान से,

नानक से औ कबीर से तीरथ से धाम से,
पहचान जिसकी होती थी साधू के नाम से,

दे सकती थी जो श्राप ज़रा सी ही भूल पर,
सूरजमुखी की पंखुडी ज्यों आधे फूल पर,

मुखड़े पे जो होती थी बड़प्पन की निशानी,
केशों की सहेली खिले गालों की जवानी,

दिन रात लोग करते थे मेहनत बड़ी गाढ़ी,
तब जाके कहीं उगती थी इस चेहरे दाढ़ी,

दाढ़ी जो लहरती थी तो तलवार सी लगती,
हो शांत तो व्यक्तित्व के विस्तार सी लगती,

दाढ़ी तो दीन दुनिया से रहती थी बेख़बर,
करते सलाम लोग थे पर इसको देख कर,

दाढ़ी में हैं सिमटे हुए कुछ भेद भी गहरे,
सूरत पे लगा देती है ये रंग के पहरे,

दाढ़ी सफेद रंग की सम्मान पाएगी,
भूरी जो हुई घूर घूर घूरी जाएगी,

दाढ़ी जो हुई काली तो कमाल करेगी,
मेंहदी रची तो रंग लाल लाल करेगी,

दाढ़ी का रंग एक सा है छाँव धूप में,
सबको ही बांध लेती है ये अपने रूप में,

दाढ़ी के बिना चेहरा बियाबान सा लगे,
भूसी से बाहर आए हुए धान सा लगे,

दाढ़ी से रौब बढ़ता है ज़ुल्फों के फेर का,
दाढ़ी तो एक गहना है बबरीले शेर का,

चेहरे पे बाल दाढ़ी के जब आ के तने थे,
लिंकन भी तभी आदमी महान बने थे,

खामोश होके घुलती थी मौसम में खुमारी,
शहनाई पे जब झूमती थी खान की दाढ़ी,

'सत श्री अकाल' बोल के चलती थी कटारी,
लाखों को बचा लेती थी इक सिंह की दाढ़ी,

मख़मल सरीख़ी थी गुरु रविन्द्र की दाढ़ी,
दर्शन में डूब खिली थी अरविंद की दाढ़ी,

दिल खोल हंसाती थी बहुत काका की दाढ़ी,
लगती थी खतरनाक बड़ी राका ही दाढ़ी,

गांधीजी हमारे भी यदि दाढ़ी उगाते,
तो राष्ट्रपिता की जगह जगदादा कहाते,

ख़बरें भी छपती रहती हैं दाढ़ी के शोर की,
तिनका छिपा है आज भी दाढ़ी में चोर की,

उगती है किसी किसी के ही पेट में दाढ़ी,
पर आज बिक रही बड़े कम रेट में दाढ़ी,

सदियों की मोहब्बत का ये अंजाम दिया है,
आतंकियों नें दाढ़ी को बदनाम किया है,

करने को हो जो बाद में वो सोच लीजिए,
पहले पकड़ के इनकी दाढ़ी नोच लीजिए,

स्पाइस ओल्ड बेच रही टीवी पे नारी,
दाढ़ी की प्रजाति हो है ख़तरा बड़ा भारी,

गुम्मे पे टिका के कहीं एसी में बिठा के,
तारों की मशीनों से या कैंची को उठा के,

पैसा कमा रहे हैं जो दाढ़ी की कटिंग में,
शामिल हैं वो संसार की मस्तिष्क शटिंग में,

ब्रश क्रीम फिटकरी की गाडी बढ़ाइए,
फिर शान से संसार में दाढ़ी बढ़ाइए,

मैं आज कह रहा हूँ कल ये दुनिया कहेगी,
दाढ़ी महान थी, महान है, और रहेगी,

चाय पिलाई जाए

आफिस से जब शाम को साहब वापस आए,
पत्नी से बोले ज़रा चाय पिलाई जाए,
चाय पिलाई जाए जरा सी अदरक वाली,
कड़क, मसालेदार, दूधिया, मिर्च भी काली,
पत्नी बोली प्राणनाथ तुम यह लो माचिस,
मैं भी थकी हुई आई हूँ फ्राम द आफिस,

मेरी एक सहेली जिसका नाम है ईशा,
उसके पति बड़े सज्जन श्रीमान कपीशा,
श्रीमान कपीशा चाय नाश्ता नित्य बनाते,
प्याज़ काटते, मूली घिसते, हंसते गाते,
संग चाय के ज़रा पकौड़ी न कर देरी,
बहुत हो गया अब प्रभुसत्ता होगी मेरी,

मेरी तेरी बात में बस इतना ही ज्ञान,
मंदिर जितना पास है दूर उतना भगवान,
दूर उतना भगवान सुनो पत्नी जी प्यारी,
बात तुम्हारी शत प्रतिशत दो कुंटल भारी,
चटपट चाय बनाकर आज मैं तुम्हें पिलाऊँ,
और पकौड़ी झटपट बढ़िया तुम्हें खिलाऊँ,

साहब नें फिर गैस में दे दी आग लगाए,
चढ़ा भगोना बन गई पानी जैसी चाय,
पानी जैसी चाय सुड़क कर पत्नी बोली,
मैं तो ऐसे ही करती थी हंसी ठिठोली,
साहब बोले प्रभुसत्ता तो होगी तेरी,
लेकिन प्रभुसत्ता वाली तो हैगी मेरी।

हंसिए बाँहें खोल कर सांसों को गहराए,
मुस्का कर ही बोलिए हाय हो चाहे बाय,
हाय हो चाहे बाय प्रेम सागर में बहिए,
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम कहीं भी रहिए,
खुले हुए जीवन के उलझे फीते कसिए,
हीही हाहा हूहू हेहे होहो हंसिए।

 
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